
महराजगंज। सरकार भले ही योजनाओं का नाम बदलकर ‘विकसित भारत गारंटी रोजगार आजीविका मिशन’ कर दे, लेकिन धरातल पर भ्रष्ट सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारियों की सोच रत्ती भर भी नहीं बदली है। निचलौल ब्लॉक क्षेत्र के मैरी ग्राम सभा से मनरेगा और रोजगार गारंटी के नाम पर चल रही सरकारी धन की खुली लूट का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां सरकारी अभिलेखों में दर्ज आंकड़े और धरातल की हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है।
मामला नंबर 1: शून्य मजदूर, जेब में लाखों का मास्टर रोल।
मैरी ग्राम सभा में प्राथमिक विद्यालय से अनिरुद्ध यादव के खेत तक सड़क की पटरी पर मिट्टी कार्य स्वीकृत है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस काम पर प्रतिदिन 44 मजदूर पसीना बहा रहे हैं और इसकी कुल अनुमानित लागत लगभग ₹1.96 लाख है। लेकिन जब हमारी मीडिया टीम ने मौके पर जाकर पड़ताल की, तो वहां मजदूरों की संख्या शून्य पाई गई! सवाल उठता है कि जब धरातल पर एक भी मजदूर नहीं था, तो यह लाख रुपये किसकी जेब में भेजे जा रहे हैं?
मामला नंबर 2: 44 का दावा, मौके पर मिले महज 23।
दूसरा काम लियाकत के घर से रामस्वरूप के खेत तक सड़क की पटरी पर मिट्टी भराई का दर्ज है। लगभग ₹1.95 लाख की इस परियोजना में भी कागजों पर रोजाना 44 मजदूरों की हाजिरी लगाई जा रही है। हालांकि, ग्राउंड जीरो पर केवल 23 मजदूर ही काम करते मिले। यानी सीधे-सीधे आधा बजट कागजी फर्जीवाड़े की भेंट चढ़ाया जा रहा है।
सवाल-1: लहलहाती फसल के बीच कहां से आ रही मिट्टी?
सबसे हास्यास्पद और बड़ा तकनीकी सवाल यह है कि सड़क के दोनों तरफ धान की लहलहाती फसलें खड़ी हैं। जब चारों तरफ लहलहाते खेत हैं, तो आखिर पटरियों पर डालने के लिए मिट्टी कहां से काटी और लाई जा रही है? यह अपने आप में प्रमाण है कि केवल कागजी एस्टीमेट बनाकर सरकारी धन का बंदरबांट किया जा रहा है।
लापरवाह और मेहरबान अफसरों पर सीधा प्रहार।
मनरेगा तकनीकी सहायक (TA) कृष्णकांत त्रिपाठी एस्टीमेट आपने बनाया, धनराशि आपने तय की, तो फिर जवाबदेही किसकी? जब भी इस लूट की बाबत TA कृष्णकांत त्रिपाठी से सवाल पूछा जाता है, तो उनका रटा-रटाया जवाब होता है “ठीक है, देखते हैं।” साहब केवल ‘देखते’ रह जाते हैं और धरातल पर भ्रष्टाचार का खेल बेधड़क जारी रहता है। क्या तकनीकी जांच के नाम पर केवल आंखें मूंदना ही इनकी जिम्मेदारी रह गई है?
अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी (APO) शिवेंद्र सूर्यवंशी।
अपनी मृदुभाषी छवि के लिए जाने जाने वाले APO साहब की इस ‘सॉफ्ट’ कार्यशैली का फायदा मातहत कर्मचारी और बिचौलिए जमकर उठा रहे हैं। उन्होंने हमेशा की तरह इस बार भी “जांच कराने” का वही पुराना आश्वासन थमा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच कागजों तक सीमित रहेगी या दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई भी होगी?
जनता का सुलगता सवाल क्या भ्रष्टाचार में सबकी मिलीभगत है।
जब मीडिया के जरिए पूरे मामले की पोल खुल चुकी है और फर्जीवाड़े के पुख्ता सबूत सामने आ चुके हैं, तब भी आखिर दोषी कर्मचारियों पर सख्त एक्शन क्यों नहीं होता? क्या अधिकारियों की यह चुप्पी और टालमटोल वाली नीति इस बात का संकेत है कि ‘बहती गंगा में हाथ धोने’ का यह खेल निचले स्तर से लेकर ऊपर तक की मिलीभगत से चल रहा है?
अब देखना यह होगा कि निचलौल ब्लॉक प्रशासन इस खुले डाके पर क्या ठोस कार्रवाई करता है, या फिर यह मामला भी फाइल में ‘देखते हैं’ की भेंट चढ़ जाएगा। रिपोर्ट: ब्यूरो कार्यालय महराजगंज।


